Tuesday, November 7, 2017

अंधकार से एक नया परिचय


बहुत दिनों से एक ख्याल मन में आता रहा कि अँधेरे को हम बुरा क्यों मानते हैं. जब भी सोंचता हूँ तो जान पड़ता है कि बुराई अँधेरे में नहीं बल्कि अँधेरे की आड़ में पल रहे अज्ञान और दुश्चरित्रता में है. फिर अँधेरे को दोष क्यों? इन्ही विचारों आगे बढ़ाया और को कुछ छंदों में बाँधा है.
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अंधकार से एक नया परिचय करवाने बैठा हूँ,
मैं द्वंद्व ठाने बैठा हूँ ।

नित यामिनी की गोद मे अठखेलियां करती प्रभा
फिर क्यों घृणा का पात्र बन अपमान सह लेता तमस,
हैं कोख में ही तिमिर के जब जन्म लेतीं रश्मियां
फिर क्यों उजाले का सदा यशगान करता है जगत।

जो सत्य को नया अर्थ दे वो गीत गाने बैठा हूँ,
मैं द्वंद्व ठाने बैठा हूँ ।

जो है चिरंतन स्वयंभू जो स्वयं सृष्टि का गर्भ है
फिर भी कलंकित है तमस ये कौन सा अभिशाप है,
वो आदि था और अनंत है हर छोर तक ब्रह्माण्ड के
जिसे मृत्युतुल्य समझ लिया उसमे अमरत्व की छाप है।

आज समर्पित अन्धकार को दीप जलाने बैठा हूँ,
मैं द्वंद्व ठाने बैठा हूँ ।

तमसो मा ज्योतिर्गमय कह ज्ञान की हुंकार हो
तो मृत्यु जैसा सत्य अंतिम, तमस भी स्वीकार हो,
ज्योति कितनी भी प्रखर हो, दिव्य दीप्त प्रचंड हो
किन्तु हर दीपक के तल में तमस का अधिकार हो।

अब रुकें न पग विवश फिर भय मिटाने बैठा हूँ
अंधकार से एक नया परिचय करवाने बैठा हूँ,
मैं द्वंद्व ठाने बैठा हूँ ।

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द्वंद्व = combat with self, conflict within
ठाने = undertaken
यामिनी = night
प्रभा = radiance of morning sun light
तमस = darkness
तिमिर = darkness
रश्मियां = dancing rays of sunlight
चिरंतन = Perpetual, everlasting
स्वयंभू = self-manifested, self-existent, one that is not born or created by something else
मृत्युतुल्य = equivalent to death

Tuesday, October 24, 2017

ज़िन्दगी पे कुछ ख्याल छोटे छोटे


ये कुछ अनायास ख्याल जो मेरे ज़ेहन में तैर रहे थे, मैंने पकड़ के छन्दो में लपेट दिए. ये इस बार कुछ अनोखे से रूप में आये हैं. त्रिपदी मालूम होते हैं, लम्बे हायकू भी कह सकते हैं. न जमे तो मुक्त कविता समझ लीजियेगा. 

1) 
मोहलत जो मिली जिंदगी समझने के लिए, फ़क़त जिंदा रहने की कोशिशों में फुंक गयी |
लम्हों की भाग दौड़ में इक उम्र चुक गयी।

[What ever little time I was given on earth was meant to fully understand the life, alas, it's all gone just in my mundane struggle to survive. The rush of moments never ended, but life has.] 

2) 
सपने बेहिसाब, अरमान हद से ज्यादा, करने को बहुत कुछ और वक़्त बहुत कम है। 
और वो पूँछते हैं जिंदगी में क्या ग़म है? 

[Countless dreams, limitless aspirations, so much to do and so little time in life. And yet, they ask "got a problem?]

3) 
एक कप चाय और डबलरोटी के दो टुकड़ों में अब शामें नहीं होतीं बेवजह ख़ुशगवार।
बड़ी बड़ी हसरतें निगल गयीं छोटी छोटी खुशियों का इंतज़ार।   

[I miss those days when just one cup hot tea and a soft roasted bread was enough to make our evenings unconditionally joyous and fulfilling. Aspiration of big wins has destroyed the innocent wait for small moments of happiness]

4)
कहीं चिथड़ों में लिपटे बेजुबां मिट्टी के घरौंदे तो कहीं जगमगाते महलों में रंगीन होती शामों की जवानी|
तारीख़ के चंद पन्ने हमारी भी कहानी और तुम्हारी भी कहानी|

[One of us might have a magnificent life of a king/queen and another one's life might be just a silence inside a muddy hut but someday both will become just a page in the history]

5)
न मज़हबों के फरमान काम आये और न ज़माने के दस्तूर, सच के बदलते चेहरों में हर कहीं झूठ की परछाईं है |
खुद की लक्ष्मण रेखाओं से ही ज़िन्दगी संभल पायी है |

[God sent commandments didn't build one's life, neither did customs of this world. Changing faces of the truth seem to have dark shadow of falsehood everywhere. If one can deal with life only by drawing their own lines of self-control]


Friday, September 23, 2016

अपनी कोई हमराज़ सी लगती है जिंदगी

शाम ढलते ही सायों से सिहरती है जिंदगी 
जिंदा रहने को क्या न करती है जिंदगी 
रात कटती है सोंच के एक रात और सही 
उजालों की उम्मीद मे गुज़रती है जिंदगी

वजहें तो हजारों थीं नाबूद बन के रहते
फिर इतना सरोकार क्यूं रखती है जिंदगी
ख़ामोशियों के शोर मे गुम हो गये अल्फ़ाज़
पर बात मेरे दिल की समझती है जिंदगी

जिंदा है धड़कनों का एहसास ख्वाब से
वरना फ़कत सामान सी लगती है जिंदगी 
नज़रों का नज़रिया है दुनिया की हकीकत
हाथों की लकीरें भी बदलती है जिंदगी

उलझे हैं फासलों मे थोड़े और बहुत के 
मिलने के लिये खुद से तरसती है जिंदगी
जी भर के जी लिये जो लम्हे वो जी लिये
पन्नों मे नहीं वक्त के बसती है जिंदगी

हर शख़्स अपने आप मे दुनिया है मुकम्मल
चेहरों पे बयां जो नहीं कहती है जिंदगी
जब खुद से रूबरू हो जीने की कशिश हो
आईने सी पाक़ीज़ा झलकती है जिंदगी

फ़ितरत नहीं रस्तों की जो ढूंढें नयी मंजिल
अक्सर मेरे कदमों से ये कहती है जिंदगी
फ़ूलों की ख्वाइशों में काँटों की है शिरकत
मुहब्बत हो रूह में तो महकती है जिंदगी

अब सोंचता हूँ कर लूँ अंधेरों से दोस्ती 
डर कर बड़ी मज़बूर सी दिखती है जिंदगी
बेइंतहा शिकवों का इरादा था मगर अब
अपनी कोई हमराज़ सी लगती है जिंदगी

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नाबूद = meaningless, irrelevant
सरोकार = concern, relatedness
फ़कत = mere
मुकम्मल = complete
रूबरू = face to face
कशिश = charm, interest
पाक़ीज़ा = pure, true
फितरत = nature, characteristics
शिरकत = partnership, companionship