Friday, September 23, 2016

अपनी कोई हमराज़ सी लगती है जिंदगी

शाम ढलते ही सायों से सिहरती है जिंदगी 
जिंदा रहने को क्या न करती है जिंदगी 
रात कटती है सोंच के एक रात और सही 
उजालों की उम्मीद मे गुज़रती है जिंदगी

वजहें तो हजारों थीं नाबूद बन के रहते
फिर इतना सरोकार क्यूं रखती है जिंदगी
ख़ामोशियों के शोर मे गुम हो गये अल्फ़ाज़
पर बात मेरे दिल की समझती है जिंदगी

जिंदा है धड़कनों का एहसास ख्वाब से
वरना फ़कत सामान सी लगती है जिंदगी 
नज़रों का नज़रिया है दुनिया की हकीकत
हाथों की लकीरें भी बदलती है जिंदगी

उलझे हैं फासलों मे थोड़े और बहुत के 
मिलने के लिये खुद से तरसती है जिंदगी
जी भर के जी लिये जो लम्हे वो जी लिये
पन्नों मे नहीं वक्त के बसती है जिंदगी

हर शख़्स अपने आप मे दुनिया है मुकम्मल
चेहरों पे बयां जो नहीं कहती है जिंदगी
जब खुद से रूबरू हो जीने की कशिश हो
आईने सी पाक़ीज़ा झलकती है जिंदगी

फ़ितरत नहीं रस्तों की जो ढूंढें नयी मंजिल
अक्सर मेरे कदमों से ये कहती है जिंदगी
फ़ूलों की ख्वाइशों में काँटों की है शिरकत
मुहब्बत हो रूह में तो महकती है जिंदगी

अब सोंचता हूँ कर लूँ अंधेरों से दोस्ती 
डर कर बड़ी मज़बूर सी दिखती है जिंदगी
बेइंतहा शिकवों का इरादा था मगर अब
अपनी कोई हमराज़ सी लगती है जिंदगी

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नाबूद = meaningless, irrelevant
सरोकार = concern, relatedness
फ़कत = mere
मुकम्मल = complete
रूबरू = face to face
कशिश = charm, interest
पाक़ीज़ा = pure, true
फितरत = nature, characteristics
शिरकत = partnership, companionship






Saturday, June 11, 2016

भूली कविता फिर से महकी

सुबह धूप की पहली किरणें
और शाम की ढलती छाया
कवि के अंतर्मन में आ कर
द्वार कल्पना का खटकाया

बड़े समय से नही सुनी है

किसी नई कविता की खनखन
कहाँ भटकता खोया खोया
हुआ अपरिचित सा कवि का मन

कविता की गति है इंद्रजाल
कवि की छवि जैसे गीतमहल
कब कैसे क्यूँ उमड़े घुमड़े
कविछन्द तरंगों की हलचल

कल की वेदी पर न्योछावर
हो जाये जब हर पल हर क्षण
तब मृग तृष्णा में उलझ उलझ
बनता अभिलाषाओं का पतझड़

अपने परिचय का भार कभी
जब और नहीं सह पाता हूँ
अपनी पहचान भुलाने को
कवि की पहचान बनाता हूँ

अब डूब रहा हूँ छन्दो में
मध्धम हो के थम जाने दो
भूली कविता फिर से महकी
अब कविता में खो जाने दो
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इंद्रजाल = magic
कविछन्द = couplets
वेदी = sacred place of sacrifice
मृग तृष्णा = mirage / illusion
अभिलाषा = desire
मध्धम = slow

Saturday, April 23, 2016

इन हवाओं में कुछ तो है...

इन हवाओं में कुछ तो है जो सांसों में घुल कर मेरी रूह के आर-पार जाता है,
जो पहचान बरसों में बनायीं वो पल में मिटा कर, मिट्टी से मेरी पहचान कराता है
बहुत हुआ खेल मन के आवारापन का, चलो अब लौट जाएँ उन्ही बचपन की गलियों में,
जिसे इंतज़ार है मेरे लौट आने का वो नुक्कड़ आज भी मेरे अनकहे किस्सा सुनाता है |

इन हवाओं में कुछ तो है जो सांसों में घुल कर मेरी रूह के आर-पार जाता है |