Saturday, February 7, 2009

मै उंगली थामे चलता हूँ...

बचपन तो कब का बीत गया, पर स्वप्नों से मन छलता हूँ
कहीं दूर क्षितिज पर यादों की मै उंगली थामे चलता हूँ |

मेरे मन में भी फूटे हैं कुछ भावों के नटखट अंकुर,
शब्दों की अर्ध सुप्त कलिका खिल जाने को अब है आतुर |

नवपत्रों पे झिलमिल झिलमिल बूंदे बन कर मै ढलता हूँ,
मै उंगली थामे चलता हूँ ...

जब लम्बी रातों सा जीवन सूना अँधियारा हो जाए
खुशियों की नन्ही परी कहीं छिप कर पलकों में सो जाए |

तब मन के आंगन के दीपक की बन दीपशिखा मै जलता हूँ
मै उंगली थामे चलता हूँ ....

हो जाता है खाली जब मधु जीवन रस का हर प्याला
बंजर हो जाती स्वप्नधरा, बुझ जाती यौवन की ज्वाला|

तब स्निग्ध प्रेम की गरमी से हिमकण की भांति पिघलता हूँ
कहीं दूर क्षितिज पर यादों की मै उंगली थामे चलता हूँ

कही दूर क्षितिज पर यादों की मै उंगली थामे चलता हूँ |

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