Saturday, February 7, 2009

रात और मदिरा

अग्नि पिघल के जल हुई
प्रेम सुधा की बूंदे मिली, मदिरा बनी
छलक पड़ी
भर गई दो चमकती आँखों में

आंखे चार हुई
धूप छाँव में समा गई
चाँद ने अंगडाई ली, पलकें झुक गयीं
प्यास और मदिरा एक होने लगे

प्रकृति ने नयन मूँद लिए
शांत, स्तब्ध चाँद नीरवता की हलचल निहारता रहा
और ज्वालामुखी से चाँदनी फूटती गई
पल थमे, रात ठंडी होके बिखरती गई

स्वांसों में ज्वार उठे
मन में समुद्र मंथन हुआ
पत्तों पे ओंस की कुछ बूंदे फिसलीं
तृप्ति ने प्याला तोड़ा

पलकें फ़िर झुकीं, झुकी ही रहीं
सूरज की पहली किरण ने वीणा के तार छेड़े
संकुचाई रात मदिरा को मौन के अंचल में छिपा कर
ले गई दूर, बहुत दूर|

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