Sunday, February 8, 2009

होली और हंगामा

रंगों की धुंधली परछाईं मन आंगन में घूम गई
कुछ गुजरे वक़्त की नटखट सी बातें मानस को चूम गयीं

अब कुछ ही दिन बाकी हैं मस्ती और हल्ले गुल्ले में
फ़िर वही पुरानी टोली और फ़िर से हुडदंग मुहल्ले में

कोई नई शरारत सूझेगी, उत्साह भरा हर पल होगा
मेरे रंगों की बौछारों पर, जाने किसका आंचल होगा
रंगों का बहाना भी होगा, कुछ छेड़ छाड़ कुछ धूम धाम
सब पढ़ना लिखना बंद पड़ा, कुछ दिन अब मस्ती सुबह शाम

हम बैठे भूले हैं दर्द सभी, ना जाने कहाँ गई फिकर
मिलना जुलना सब लोगों से, घर से बाहर रहना दिन भर

होली के दिन कुछ हटके हैं, फ़िर कब ऐसा मौसम होगा
कितना भी मचाएं हंगामा, सच कहता हूँ कम होगा

बस बैठा सोंच रहा हूँ मैं, कल की यादें कल के सपने
रंगों की धुंधली परछाईं, है दिखा गई फ़िर रंग अपने
रंगों की धुंधली परछाईं, है दिखा गई फ़िर रंग अपने |

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