Saturday, February 7, 2009

यौवन वही सराहा जाता ...

यौवन वही सराहा जाता जो मदिरा के रंग ढले
नयनो में हो मधुशाला, वांणी का मधु दिन रात छले

अन्तर की अग्नि धधकती हो, हर अंग पुष्प की माला हो
ज्यों मधु प्याले में ज्वाला हो, ज्वाला जो मधु का प्याला हो
कोमल मदमाते अधरों पे सुख सात स्वर्ग अपवर्ग मिले
यौवन वही सराहा जाता ...

मैं भ्रमर महकती कलियों का
कलियों तक जाती गलियों का
गलियों में बिखरे यौवन का
यौवन में डूबे तन मन का

जिसे छूने भर से हलके हलके कोई मलय पवन सी बह निकले
यौवन वही सराहा जाता ...

बाँहों में मधुकर की सरिता
आलिंगन से सब कुछ विस्मृत
फ़िर क्या क्षण पल की सीमाएं
मिल गया जिसे प्रेम अमृत

जिसे यौवन की चिंगारी से हर युवा ह्रदय में दीप जले
यौवन वही सराहा जाता ...

जिसकी कोमलता निर्मल हो
और मर्यादा का अंचल हो
जिसकी मदिरा में विष न हो
पावन अंतर मन चंचल हो

जहाँ प्रेम पले जीवन रस से, वो छाँव हो प्यारी छाँव तले
यौवन वही सराहा होता जो मदिरा के रंग ढले
यौवन वही सराहा जाता जो मदिरा के रंग ढले|

नोट: ये कविता मैंने आई आई टी के दिनों में एक कविता प्रतियोगिता में दी थी और प्रथम पुरुष्कार भी जीता। :-)

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