Sunday, March 15, 2009

हमारी बिसरती परम्पराओं का आइना ये बक्सा

क़स्बा के ब्लॉग पे एल्मुनिम के बक्से की बहुत अच्छी कविता पढ़ी। मेरे अन्दर के कवि से रहा नही गया और मैंने कविता को अपनी तरफ़ से और विस्तार दे दिया। http://naisadak.blogspot.com/2009/03/blog-post_15.html

कुछ सपने और ढेर सारी भावनाओ का अथाह समंदर बना जाता ये बक्सा
पीढ़ी दर पीढ़ी और रहस्यमयी बना जाता ये बक्सा
पता नही कब भेंट चढ़ जाए बदलते जीवन मूल्यों और दृष्टिकोणों की
जिंदा है आज दादी और नानी के दिनों की यादों से ये बक्सा

किसी दिन आखिरी बार खुलेगा ये बक्सा
और फ़िर हमेशा हमेशा के लिए बस माँ की कहानियो में मिलेगा ये बक्सा
कहने को तो बस है एक एल्मुनियम का टुकड़ा ही है ये
पर हमारी बिसरती परम्पराओं का आइना है ये बक्सा।

2 comments:

  1. मात्र डेढ घंटे मिले आपको और आपने कविता को बढा दिया ... सही भावनाओं के साथ ... बहुत बहुत बधाई।

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  2. wah, mujhe bhi nahi raha gya tha, so ravish ke blog pe comment me aapni batt kah dee.
    waise aapne badhakar aacha kia.

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