Wednesday, March 18, 2009

कवि की बात कवि ही जाने

जीवन की किसी परिचर्चा में एक दिन
किसी ने पूँछ लिया बड़ा मौलिक प्रश्न
आखिर आप कविता लिखते कैसे है श्रीमान
मैंने सोंचा प्रश्न वाकई मौलिक है और इतना भी नही है आसान
तो क्या करूं, उत्तर कहा खोजूं, या फ़िर चुप ही रहूँ, हंस के टाल दूँ
या फ़िर जीवनदर्शन की गहराइयों में घुमा के हवा में उछाल दूँ
अभी मै उत्तरों के विन्यास में छटपटा ही रहा था कि तभी
मेरे अन्दर के इंजिनियर ने मौके का फायदा उठाया
इससे पहले मै कुछ सोंच पाता, उसने बेधड़क अपना उत्तर सुझाया
"कविता लिखने में क्या है, शब्दों के भण्डार का खेल है
भाषा की पकड़ और तुकबंदी का सीधा सा मेल है
हैं जी।
मै तो कहता हूँ कविता कोई भी लिख ले जो पढ़ा लिखा हो
कठिन कठिन शब्द इकठ्ठे कर लो
ना जुगाड़ हो तो शब्दकोष पकड़ लो
चार पॉँच कवितायें पढ़ो
थोड़ा इधर उधर से उठा लो, थोड़ा अपनी गढ़ो"
मै चुपचाप सुनता रहा
लेकिन मेरा मन कुछ और ही धुनता रहा
अब मेरे अन्दर के कलाकार की बारी थी
मेरी उधेड़ बुन अभी भी जारी थी
एक नया पक्ष उभरने लगा
"कविता भावनाओं का शब्दीकरण है
भाषा का कोई बंधन नही
क्यों की भावनाओ का अपना अलग व्याकरण है
मन के चित्र शब्दों में उतरते जाते हैं
हम तो भावनाओं में बहते हैं और कविता लिखते जाते हैं"
धन्यवाद! मैंने कहा और कल्पना की उड़ान को दिया विश्राम
ना तो इंजिनियर और ना कलाकार से बन रहा है काम
इतनी साधारण बात को व्याख्यानों में क्यों उलझाना है
कविता को कविता ही रहने देते है, दर्शन शास्त्र क्यों बनाना है
तो मैंने हाथ जोड़ लिए और मुस्कुराया
बस एक सीधा सा उत्तर मेरी समझ में आया
मैंने कहा
भाईसाहब, क्या कहूं मै कविता कैसे लिखता हूँ,
बस ईश्वर की कृपा समझिये
और तो कुछ कह नही सकता मगर जब भी समय मिले
मेरी कविता जरूर पढ़ते रहिये

मेरी कविता जरूर पढ़ते रहिये।

1 comment:

  1. जरुर पढ़ते रहेंगे आपकी कविता.

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