Friday, March 20, 2009

अंतर्मन पे अभिव्यक्ति (नीसू जी की कविता से प्रेरित)

नीसू जी की कविता पढ़ी मन (http://neeshooalld.blogspot.com/2009/03/blog-post_20.html), बड़ी सरल और छोटी। मेरे कवि ने भाव उधार लिए और चार पंक्तियाँ रच ली...:-)

अंतर्मन बस एक झरोखा
सच है या फ़िर कोई धोखा
मन की गति तो मन ही जाने
भला सोंच के भी क्या होगा

चाल न समझूं, रंग जानू
किसी रूप में न पहचानू
अभी परे है मेरी समझ के
फ़िर भी इसकी बात मै मानू

आखिर क्या है ये मन
चिंतन?
स्पंदन?
या बस एक कल्पना का बंधन?

3 comments:

  1. आखिर क्या है ये मन
    चिंतन?
    स्पंदन?
    या बस एक कल्पना का बंधन?

    --बहुत बढ़िया चिन्तन!!

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  2. बहुत सुंदर लिखा ... क्‍या बात है।

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  3. बहुत खूब राकेश जी आपने बात को और अच्छी तरह से व्यक्त किया है इस रचना में । धन्यवाद

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