Saturday, May 9, 2009

एक शिकायत ज़िन्दगी से...

ए ज़िन्दगी कहाँ ले जा रही है तू मुझको
न तो रास्ते की पहचान और न ही मंजिल की कुछ ख़बर
बस कदम दर कदम सुबह से शाम तक दौड़ा रही है मुझको

मेरी हमदर्द है तू या फ़िर कोई अजनबी
समझना हो रहा है मुश्किल
क्यूँ इतना धुंधला आइना दिखा रही है मुझको

कामयाबी की उम्मीद तो करने दे
वक्त की रफ़्तार से थोड़ा आगे तो बढ़ने दे
क्यूँ अभी से नाकामयाबी की मायूसी में उलझा रही है मुझको

एक दिन तो चले जाना ही है तू भी जानती है और मैं भी
जी लेने दे जब तक साँस बाकी है सीने में
क्यूँ जी लेने के अरमानो पे अभी से कफ़न उढ़ा रही है मुझको

तू भी खुश रह और रहने दे खुश मुझे भी
अँधेरा है बहुत, दूर तक और गहरा भी
कहीं दूर से एक रोशनी की किरण अपने पास बुला रही है मुझको

ए ज़िन्दगी ये कहाँ लेके जा रही है मुझको।

1 comment:

  1. कभी कभी ज़िन्दगी से शिकवा करना अच्छा लगता है बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है शुभ्कामनायें

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