Saturday, May 16, 2009

लक्ष्य और दुविधा...

मन माला सब बिखर रही है गीत कौन सा मै गाऊँ
बढ़ा कारवां लक्ष्य साध, मन दुविधा में, क्या रुक जाऊं?

सिमट सिमट के रह जाएगा, काल चक्र की परतों में बस
बुना बटोरा तिनका तिनका रिश्तों का हर ताना बाना।
धर्म कर्म कर्तव्य में उलझी अभिलाषा की जंजीरों से,
मुक्त हो रहा जीवन पंक्षी, ढूंढेगा फ़िर कोई नया ठिकाना।

ह्रदय और मन उलझे दोनों, किसे सुनूँ और किसे भुलाऊँ
मन माला सब बिखर रही है गीत कौन सा मै गाऊँ

पथिक और पथ, संग परस्पर, मिलकर पग पग बनते पूरक
और थमे जब चरण कहीं पर, करने को विश्राम घड़ी भर
पलक झपकते बरसों बीते, बस गई दुनिया रंग बिरंगी
भूल चला क्या पथिक लक्ष्य भी, इस दुनिया के रंग में रंग कर

हर रचना का एक रचयिता, क्या सच समझूं क्या ठुकराऊँ
मन माला सब बिखर रही है गीत कौन सा मै गाऊँ

संगी साथी दुनिया वाले, डाल बसेरा ठहर गए जो
कब के भटके पथिक सभी हैं, लक्ष्य और पथ दोनों भूले
पथ अनंत है, मार्ग कठिन है , जगह जगह पर सुंदर डेरे
पग स्थिर हों उससे पहले, लक्ष्य स्वयं का स्थिर कर ले

अंतर्मन की धुंध छंटी पर, मन का मोह कहाँ ले जाऊं
मन माला सब बिखर रही है गीत कौन सा मै गाऊँ

बढ़ा कारवां लक्ष्य साध, मन दुविधा में, क्या रुक जाऊं?

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