Saturday, June 11, 2016

भूली कविता फिर से महकी

सुबह धूप की पहली किरणें
और शाम की ढलती छाया
कवि के अंतर्मन में आ कर
द्वार कल्पना का खटकाया

बड़े समय से नही सुनी है

किसी नई कविता की खनखन
कहाँ भटकता खोया खोया
हुआ अपरिचित सा कवि का मन

कविता की गति है इंद्रजाल
कवि की छवि जैसे गीतमहल
कब कैसे क्यूँ उमड़े घुमड़े
कविछन्द तरंगों की हलचल

कल की वेदी पर न्योछावर
हो जाये जब हर पल हर क्षण
तब मृग तृष्णा में उलझ उलझ
बनता अभिलाषाओं का पतझड़

अपने परिचय का भार कभी
जब और नहीं सह पाता हूँ
अपनी पहचान भुलाने को
कवि की पहचान बनाता हूँ

अब डूब रहा हूँ छन्दो में
मध्धम हो के थम जाने दो
भूली कविता फिर से महकी
अब कविता में खो जाने दो
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इंद्रजाल = magic
कविछन्द = couplets
वेदी = sacred place of sacrifice
मृग तृष्णा = mirage / illusion
अभिलाषा = desire
मध्धम = slow

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