Friday, March 23, 2018

इंसानियत का बोझ


वैसे मै dark poetry (काली कवितायेँ), खासकर सामयिक विषयों पर कम ही लिखता हूँ. आज अनायास ही शब्दों का बहाव न जाने क्यों इस शैली की तरफ चला गया. कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं सामाजिक विकृति और मानवीय अधोपतन के बढ़ते बवंडर के ऊपर. 
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ज़रूरत पड़ी तो, 
जज़्बातों को खेलने का सामान बना लिया| 
मौका मिला तो, 
लम्हों को हैवानियत का श्मशान बना लिया |
ख़ुद की नज़रों में गिर गए और फिर गिरते ही रहे उम्र भर,
आंखे मूँद लीं,
तमाशों के बीच बेबसी में जीना आसान बना लिया |

आइने तोड़ दिए
शब्दों के जाल को अपनी पहचान बना लिया |
रिश्ते स्वांग बनते गए तो,
ख़ुद को मुखौटों की दुकान बना लिया |
मंज़िले ढूंढने का शौक़ अब किसी को नही मेरी दुनिया मे, 
रास्ते ज़िन्दगी का सच बन गए, डेरों को और आलीशान बना लिया |

दुनिया ने कहा सब बिकाऊ है तो पैसे को अपना ईमान बना लिया,
माँ की कोख़ में तो मासूम ही थे, समझदार हुए तो पाप को मेहमान बना लिया |
सिकुड़ती सोंच के नासूर पर कितना और मरहम लगाते,
इंसान बन नही पाए तो ख़ुद को हमने भगवान बना लिया |
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जज़्बातों - Feelings
लम्हों - (weak) Moments
हैवानियत - Animal Instinct
श्मशान - Graveyard
तमाशों - Public Drama / Show
बेबसी - Helplessness
आइने - Mirrors
शब्दों के जाल - Web of words
पहचान - Identity
स्वांग - Acting / Pretence
मुखौटों - Masks
डेरों - Camp/Tent/temporary shelter
आलीशान - Grand
बिकाऊ - For Sale
कोख़ - Womb
मासूम - Innocent
नासूर - Incurable Wound / Cancer
मरहम - Ointment

- Rakesh

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